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Sed do eiusmod temaor ( By: Jhon Doe )

Sed do eiusmod. ( By: Jhon Doe )

Sed do eiusmod temaor. ( By: Jhon Doe )

दोस्तों, बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर का जीवन सतत संघर्ष और सफलता का ऐसा समन्दर है जिसमे खोजा जाए तो हमें ज्ञान और प्रेरणा रुपी बहुमूल्य रत्न प्राप्त हो सकते हैं. और आज AchhiKhabar.Com (AKC) पर मैं आपके साथ ऐसे ही पांच रत्न यानि पांच प्रेरक कहानियां व प्रसंग साझा कर रहा हूँ.

#1: बाबासाहेब की ईमानदारी

यह आज़ादी के पहले की घटना है. 1943 में बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर को वाइसराय काउंसिल में शामिल किया गया और उन्हें श्रम मंत्री बना दिया गया. इसके साथ ही  लोक निर्माण विभाग (PWD) भी उन्ही के पास था. इस विभाग का बजट करोड़ों में था और ठेकेदारों में इसका ठेका लेने की होड़ लगी रहती थी.

इसी लालच में दिल्ली के एक बड़े ठेकेदार ने अपने पुत्र को बाबासाहेब के पुत्र यशवंत राव के पास भेजा और बाबासाहेब के माध्यम से ठेका दिलवाने पर अपना पार्टनर बनाने और 25-50% तक का कमीशन देने का प्रस्ताव दिया. यशवंत राव उसके झांसे में आ गए और अपने पिता को यह सन्देश देने पहुँच गए.

जैसे ही बाबासाहेब ने ये बात सुनी वो आग-बबूला हो गए. उन्होंने कहा-

“मैं यहाँ पर केवल समाज के उद्धार का ध्येय को लेकर आया हूँ। अपनी संतान को पालने नहीं आया हूँ। ऐसे लोभ-लालच मुझे मेरे ध्येय से डिगा नहीं सकते।”

और उसी रात यशवंत को भूखे पेट मुम्बई वापस भेज दिया.

Source: पुस्तक ‘युगपुरुष बाबासाहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर’

#2: बाबासाहेब और लाइब्रेरियन

डॉ. आंबेडकर ने अपने जीवन में बहुत से कष्ट सहे लेकिन कभी भी अपनी  शिक्षा को प्रभावित नहीं होने दिया. वह हर दिन 14 से 18 घंटे तक अध्ययन किया करते थे. शिक्षा के प्रति उनकी ललक और जी तोड़ मेहनत का ही परिणाम था कि बड़ौदा के शाहू महाराज जी ने उन्हें उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेज दिया था.

डॉ. बी आर आंबेडकर प्रेरक प्रसंग व कहानियां

  बाबासाहेब को किताबें पढने का बड़ा शौक था. माना जाता है कि उनकी पर्सनल लाइब्रेरी दुनिया की सबसे बड़ी व्यक्तिगत लाइब्रेरी थी, जिसमे 50 हज़ार से अधिक पुस्तकें थीं.लन्दन प्रवास के दौरान वे रोज एक लाइब्रेरी में जाया करते थे और घंटों पढाई किया करते थे. एक बार वे लंच टाइम में अकेले लाइब्रेरी में बैठ-बैठे  ब्रेड का एक टुकड़ा खा रहे थे कि तभी लाइब्रेरियन ने उन्हें देख लिया और उन्हें डांटने लगा कि कैफेटेरिया में जाने की बजाय वे यहाँ छिप कर खाना खा रहे हैं. लाइब्रेरियन ने उनपर फाइन लगाने और उनकी मेम्बरशिप ख़त्म करने की धमकी दी.

तब बाबासाहेब ने क्षमा मांगी और अपने और अपने समाज के संघर्ष और इंग्लैंड आने के की वजह के बारे में बताया. उन्होंने यह भी बड़ी ईमानदारी से कबूल किया कि कैफेटेरिया में जाकर लंच करने के लिए उनके पास पर्याप्त पैसे नहीं हैं.

उनकी बात सुनकर लाइब्रेरियन बोला-

आज से तुम लंच आर्स में यहाँ नहीं बैठोगे तुम मेरे साथ कैफेटेरिया चोलोगे और मैं तुमसे अपना खाना शेयर करूँगा.

वह लाइब्रेरियन एक यहूदी (Jew) था और उसके इस व्यवहार के कारण बाबासाहेब के मन में यहूदियों के लिए एक विशेष स्थान बन गया.

#3: ख़याल कौन रखेगा?

यह घटना तबकी है जब डॉ. आंबेडकर जब अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे थे. वह रोज सुबह लाइब्रेरी खुलने से पहले ही वहां पहुँच जाते थे और सबके जाने के बाद ही वे वहां से निकलते थे. यहाँ तक कि वे कई बार लाइब्रेरी की टाइमिंग ख़त्म होने के बाद भी वहां बैठे रहने की अनुमति माँगा करते थे.

उन्हें रोज ऐसा करते देख एक दिन चपरासी ने उनसे कहा, “क्यों तुम हमेशा गंभीर रहते हो, बस पढाई ही करते रहते हो और कभी किसी दोस्त के साथ मौज-मस्ती नहीं करते.”

तब बाबा साहेब बोले-

“अगर मैं ऐसा करूँगा तो मेरे लोगों का ख़याल कौन रखेगा?”

#4: संस्कृत का ज्ञान

डॉ. अम्बेडकर को स्वतंत्र भारत के नए संविधान की रचना के लिए बनी संविधान मसौदा समिति (Drafting Committee of the Constitution) का अध्यक्ष बनाया गया.

बात जब scheduled languages की लिस्ट तैयार करने की आई तो बाबासाहेब उसमे सभी भाषाओँ की जननी संस्कृत को भी स्थान देना चाहते थे. हालांकि, अधिकतर सदस्यों के विरोध के कारण ऐसा नहीं हो पाया. लेकिन इस दौरान जब एक बार संस्कृत भाषा को लेकर श्री लाल बहादुर शाश्त्री और आंबेडकर जी के बीच चर्चा हो रही थी तब लोगों ने देखा कि दोनों ही महान हस्तियाँ संस्कृत में वार्तालाप कर रही हैं.

शाश्त्री जी से संस्कृत भाषा का ज्ञान होने की उम्मीद तो की जा सकती थी पर अशिक्षित दलित परिवार में जन्में बाबासाहेब भी संस्कृत भाषा पर इतनी पकड़ रखते हैं यह किसी ने नहीं सोचा था. जल्द ही ये बात मीडिया में छा गयी और सभी आंबेडकर जी के ज्ञान का लोहा मानने लगे. #5: No Peon, No Water / चपरासी नहीं, पानी नहीं 

बाबासाहेब महार जाति से थे जिसे अछूत माना जाता था. यही कारण था कि वे विद्यालय में बाकी छात्रों के साथ नहीं बैठ सकते थे और उन्हें कक्षा के बाहर बैठ कर पढना पड़ता था. इसके अलावा उन्हें विद्यालय का नल छूने की भी अनुमति नहीं थी, जबकि बाकि के छात्र जब चाहे तब नल चला कर पानी पी सकते थे.

उन्हें सिर्फ एक ही सूरत में पानी मिल सकता था, जब विद्यालय का चपरासी भी उपस्थित हो, यही वह नहीं होता था तो कोई और भी उन्हें नल चला कर पानी नहीं देता था. इसी स्थिति को उन्होंने बाद में अपने एक article में एक लाइन में summarize किया है-

“No peon, no water.”